ब्रेस्ट कैंसर: जांच से इलाज तक
ब्रेस्ट कैंसर दुनिया में सबसे आम प्रकार का कैंसर है, जो दुनिया भर में लाखों लोगों की जान ले लेता है। प्राथमिक जांच के माध्यम से स्क्रीनिंग के नए और बेहतर तरीके सामने आए हैं जिससे महिलाओं को स्तन कैंसर के शुरुआती संकेतकों के बारे में शिछित करना काफी आसान हो गया है।
स्तन कैंसर का
पता लगाने के कुछ तरीके निम्न हैं :
20 साल की उम्र से ही हर महीने
पीरियड्स खत्म होने के पांच दिन बाद ब्रेस्ट की स्वतः जांच करें (पोस्टमेनोपॉज़ल
महिलाएं महीने का कोई भी दिन निश्चित कर सकती हैं), 20 वर्ष की आयु के बाद
किसी प्रशिक्षित चिकित्सक द्वारा ब्रेस्ट की सालाना जांच, तथा 45 साल की उम्र के बाद रेगुलर मैमोग्राम करवाएं।
निम्न में से
कोई भी लक्षण ब्रेस्ट कैंसर का संकेत हो सकता है:
· ब्रेस्ट तथा बगल में
गांठ का पड़ना जो कि समय के साथ बढ़ता जाता है तथा आमतौर पर दर्द रहित होता है
·
निप्पल से लाल या
दूधिया रंग का डिस्चार्ज
·
हाल में ही निप्पल का
इंवर्जन, अल्सरेशन या खराब होना
·
ब्रेस्ट की त्वचा में
डिंपल पड़ना
·
संतरे के छिलके की तरह
ब्रेस्ट की त्वचा का मोटा हो जाना
ब्रेस्ट कैंसर का निदान तथा इसके विभिन्न स्टेज
मैमोग्राम करने
के बाद, ब्रेस्ट कैंसर की पुष्टि एक नीडल बायोप्सी के द्वारा ओपीडी में 10 से 15 मिनट में किया जा सकता है। कभी-कभी इसके लिए एम्आरआई तथा अल्ट्रासाउंड की जरूरत भी पड़ती है। ऐसे
रोगी जिनकी गांठ बड़ी है या फिर उनके बगल में ग्रंथियां काफी बढ़ गई हैं, में कोई अन्य अंग शामिल हो सकता है (हड्डी में दर्द, सांस फूलना, सिरदर्द, बढ़े हुए जिगर आदि), यह सुनिश्चित करना आवश्यक है की बीमारी अन्य अंगों तक ना पहुंच गई हो।
ब्रेस्ट कैंसर के विभिन्न चरण और उसका उपचार
ब्रेस्ट कैंसर
की चार स्टेजेस होती हैं -
·
स्टेज 1 एंड 2 - (शुरुआती कैंसर)
इसमें आमतौर पर पहले सर्जरी द्वारा इलाज किया जाता है तथा उसके बाद का ट्रीटमेंट
बायोप्सी के अंतिम परिणाम प्राप्त होने के बाद निर्धारित किया जाता है।
·
स्टेज 3 (स्थानीय रूप से उन्नत ब्रेस्ट कैंसर)- स्टेज 3 आने के बाद आमतौर पर
कीमोथेरेपी की जाती है, तत्पश्चात सर्जरी तथा रेडिएशन की सहायता ली जाती है। हार्मोनल थेरेपी तथा
टारगेटेड थेरेपी कुछ विशेष मरीजों में की जाती है जिनके टयूमर्स में विशेष तरह के
मार्कर्स पाए जाते हैं।
·
स्टेज 4
(दूर के अंगों में फैलाव)- इसमें आमतौर
पर या तो कीमोथेरेपी की जाती है या फिर हार्मोनल थेरेपी का सहारा लिया जाता है, कभी-कभी दोनों तरीकों से इलाज किया जाता है। लक्षणों के अनुसार थेरेपी का
चुनाव किया जाता है जैसे कि ब्रेस्ट में अल्सरयुक्त ट्यूमर, हड्डी रोग अथवा दर्द निवारण के लिए रेडिएशन, दर्द निवारक दवाओं का
इस्तेमाल, ब्रेस्ट से द्रव्य का बाहर निकालना आदि।
उपचार के कितने तरीके हैं तथा उनके दुष्प्रभाव क्या हैं ?
उपचार के
विभिन्न तरीके निम्नलिखित हैं:
· ब्रेस्ट कंजर्वेशन सर्जरी (बीसीएस)- बीमारी के शुरुआती चरण में ज्यादातर
महिलाओं के ब्रेस्ट को बचाया जा सकता है। कीमोथेरेपी के द्वारा बड़े टयूमर्स को कम
करने के बाद बीसीएस किया जा सकता है। ब्रेस्ट के आकार को सही बनाए रखने के लिए
कभी-कभी प्लास्टिक सर्जरी तकनीकी का इस्तेमाल करना पड़ता है (ओंकोप्लास्टी)।
· ब्रेस्ट रिमूवल (मास्टेक्टॉमी) - जो लोग मास्टेक्टॉमी कराते हैं, ऐसा नहीं है कि उनमें एडवांस डिजीज है। बीमारी की प्रारंभिक अवस्था में
कभी-कभी ब्रेस्ट के व्यापक क्षेत्र में प्रीकैंसरस बदलाव हो सकते हैं अथवा वहां पर
मल्टीपल टयूमर्स एक दूसरे से काफी दूरी पर मौजूद हो सकते हैं (मल्टीसेंट्रिक
डिजीज)। ब्रेस्ट का पुनर्निर्माण रोगी के अपने टिशु से किया जा सकता है या
सिंथेटिक इम्प्लांट के साथ या उसके बिना भी किया जा सकता है।
कीमो और हार्मोन थेरेपी कैसे काम करती है?
ट्यूमर
कोशिकाओं पर कुछ मार्कर होते हैं जिससे कि हार्मोनल अथवा टारगेटेड थेरेपी का
निर्णय लिया जाता है। कीमोथेरेपी आमतौर पर 15 से 21 दिनों के अंतराल पर डे-केयर में 6 से 8 चक्रों में पूरी की जाती है। हार्मोनल थेरेपी टेबलेट के रूप में 5 साल या उससे अधिक तक की जाती है, इसमें टारगेटेड थेरेपी की भी
आवश्यकता पड़ सकती है जिसे लगभग 1 साल तक दिया जाता है। कीमोथेरेपी के कई
साइड इफेक्ट्स हैं जैसे कि बाल झड़ना, मतली, उल्टी, कमजोरी आदि लेकिन इनमें से ज्यादातर को आधुनिक दवाइयों से ठीक किया जा सकता
है। कीमोथेरेपी बंद होने के बाद बालों का वापस बढ़ना शुरू हो जाता है।
रेडिएशन थेरेपी कैसे मदद करती है?
सभी रोगी जो
बीसीएस से गुजरते हैं, चाहे वह बड़े ट्यूमर के मरीज हो अथवा उनमें लिम्फ ग्रंथियां भी शामिल हों, को सर्जरी तथा सामान्य थेरेपी के साथ रेडिएशन थेरेपी दी जाती है। आधुनिक
रेडिएशन तकनीकी की सहायता से त्वचा, फेफड़े और हृदय पर होने वाले
दुष्प्रभावों को कम किया जा सकता है। रेडिएशन थेरेपी का एक सेशन 30 से 35 दिनों का होता है और यह ओपीडी में किया जाता है। कुछ खास तरह के मरीजों में
नई तकनीकों की सहायता से इस अवधि को कम किया जा सकता है। उपचार के दुष्प्रभावों की
निगरानी के लिए समय-समय पर जांच कराना आवश्यक है जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके
की रोग दोबारा से ना आ जाए। शुरुआत में जांच के लिए कई बार जाना पड़ सकता है लेकिन
जैसे-जैसे समय बढ़ता है जांच के बीच का अंतराल भी बढ़ जाता है और 5 साल के बाद सालाना जांच ही की जाती है।

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